स्वप्रबन्धन की पंचकोशीय अवधारणा को संरचनात्मक ढ़ग से निरूपित करने वाली लेखक की पहली पुस्तक ‘पंचकोशीय यौगिक स्वप्रबन्धन’ है। इसी अवधारणा में पातंजल योगसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता के सूत्रों को पिरोने का कार्य पंचकोशीय स्वप्रबन्धन (पातंजल योगसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता के आलोक में) इस पुस्तक में किया गया है। सप्त अध्याय में विभाजित यह पुस्तक विषय को विश्लेष्णात्मक ढ़ग से व्याख्यायित करती है। इस पुस्तक के दो मूलभूत आधार ग्रंथ पातंजल योगसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता हैं; जिसमें प्रथमतः ग्रंथों का संक्षिप्त परिचय देकर योग के सिद्धान्त एवं योग के प्रयोजन को स्पष्ट किया गया है। दोनों ग्रंथों में निहित योग के समस्त पहलुओं, तथ्यों एवं युक्तियों की उपयोगिता को स्वप्रबन्धन के संदर्भ में वर्णित किया गया है। उन समस्त तत्वों के सांगोपांग पर आधारित अंतिम अध्याय में स्वप्रबन्धन के बाधक एवं साधक तत्वों का सम्यक् विवेचन किया गया है। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य जीवन प्रबन्धन के सूत्रों को शास्त्र सम्मत् व्यवहारिक दृष्टि प्रदान करना है। इस पुस्तक में शोधपरक विश्लेषण, शास्त्रीय सन्दर्भ एवं व्यवहारिक दृष्टि का सन्तुलित समन्वय है। मुझे आशा है अभिरूचि रखने वाले पाठकों, शोधार्थियों, योग-अध्येताओं के लिए यह कृति सरल एवं प्रामाणिक सिद्ध होगी।
RELIGION / Spirituality
Panchkoshiy Swaprabandhan
₹350.00
By: Dr. Akhilesh Kumar Vishwakarma
ISBN: 9789366654409
Language: Hindi
Pages: 208
Format: Paperback
Category: RELIGION / Spirituality
Delivery Time: 7-9 Days





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