प्रस्तुत कृति ‘कबीर का सामाजिक चिंतन’ मध्यकालीन भारत के उद्भट क्रांतिधर्मा कवि और युगद्रष्टा संत कबीर के लोक-कल्याणकारी विचारों का एक तात्विक विवेचन है। कबीर केवल एक साधक ही नहीं, अपितु एक प्रखर समाज-सुधारक थे, जिन्होंने अपनी कालजयी वाणी से युगीन विसंगतियों पर करारा प्रहार किया। इस पुस्तक का मूल उद्देश्य कबीर के उस सामाजिक दर्शन को रेखांकित करना है, जो रूढ़िवाद, पाखंड और सांप्रदायिक संकीर्णता के तिमिर को चीरकर एक समतामूलक समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। कबीर के चिंतन के केंद्र में ‘मनुष्यता’ सर्वोपरि है। उन्होंने वर्ण-व्यवस्था की जड़ता और बाह्याचारों के निरर्थक प्रदर्शन का पूर्णतः निषेध करते हुए ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के महान भारतीय आदर्श को पुनर्जीवित किया। इस ग्रंथ में कबीर की साखियों, पदों और रमैणियों के माध्यम से उनके आर्थिक न्याय, नारी-विषयक दृष्टिकोण और जाति-विहीन समाज की संकल्पना का गहन अन्वेषण किया गया है। लेखक का यह विनम्र प्रयास है कि वर्तमान विखंडित समाज में कबीर के ऐक्यकारी संदेशों की प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया जा सके। यह पुस्तक शोधार्थियों, साहित्य-प्रेमियों और सामाजिक चेतना के जिज्ञासुओं के लिए एक वैचारिक सेतु के रूप में सिद्ध होगी, जो कबीर के निर्गुण निराकार भक्ति के आवरण में छिपे अत्यंत सुदृढ़ सामाजिक सरोकारों को उद्घाटित करती है।
Literary Criticism & Social Thought
Kabir Ka Samajik Chintan
₹350.00
By: Dr. Rekha Goswami & Dr Ritudhwaj Singh
ISBN: 9789366650098
Language: Hindi
Pages: 204
Format: Paperback
Category: Literary Criticism & Social Thought
Delivery Time: 7-9 Days

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