महर्षि श्रेणिक वाणी भाग–1,आत्मतत्त्व खोज एक ऐसी आध्यात्मिक कृति है, जिसमें 500 दोहों के माध्यम से आत्मा, अहंकार, मृत्यु, जन्म-मरण, कर्म, माया, त्रिगुण, ध्यान, समाधि, विवेक, मौन, आत्मज्ञान और मोक्ष जैसे गहन विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए लिखे गए दोहों का संग्रह नहीं है, बल्कि मनुष्य को स्वयं के भीतर उतरकर अपने वास्तविक स्वरूप को खोजने की प्रेरणा देती है। संसार में मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा, परिवार, भोग और बाहरी उपलब्धियों के पीछे निरंतर दौड़ता रहता है, लेकिन अपने भीतर स्थित उस चेतना को भूल जाता है, जो उसके समस्त जीवन की आधार शक्ति है। यह वाणी उसी भूले हुए आत्मतत्त्व की ओर साधक का ध्यान ले जाती है।पुस्तक के दोहों में मृत्यु को जीवन का अंत न मानकर एक परिवर्तन और आगे की यात्रा के रूप में देखने, अहंकार को बंधन का मूल समझने, कर्मों के प्रति सजग रहने तथा सुख-दुःख को जीवन की स्वाभाविक लहरों के रूप में स्वीकार करने का संदेश मिलता है। साथ ही, माया और प्रकृति के त्रिगुणों के प्रभाव को समझते हुए विवेक, ध्यान और आत्मचिंतन के द्वारा उनसे ऊपर उठने की दिशा दिखाई गई है।इस कृति का विशेष केंद्र आत्मतत्त्व की खोज है। पुस्तक बार-बार साधक को बाहरी संसार में उलझने के बजाय अपने भीतर देखने, मन के विचारों को साक्षीभाव से देखने, चित्त को शांत करने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए प्रेरित करती है। इसमें यह भाव प्रमुख है कि मनुष्य का वास्तविक कल्याण केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आत्मबोध और अंतर्मुखी साधना से होता है।500 दोहों के साथ दिए गए अर्थ और व्याख्याएँ गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को सामान्य पाठक के लिए सरल और सहज बनाने का प्रयास करती हैं। इसमें गृहस्थ, साधक, संन्यासी और आध्यात्मिक जिज्ञासु सभी अपने जीवन से जुड़े प्रश्नों पर चिंतन के सूत्र पा सकते हैं।“महर्षि श्रेणिक वाणी भाग–1 : आत्मतत्त्व खोज” का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपने जीवन को केवल संसार प्राप्त करने में न गंवाए, बल्कि स्वयं को जानने की यात्रा भी आरंभ करे। जब भीतर विवेक जागता है, अहंकार ढीला पड़ता है, मन शांत होता है और आत्मतत्त्व की खोज गहरी होती है, तब जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आने लगता है।यह पुस्तक पाठक को किसी बाहरी उपलब्धि की ओर नहीं, बल्कि अपने ही भीतर स्थित सत्य की खोज की ओर आमंत्रित करती है,क्योंकि जिस मनुष्य ने स्वयं को जान लिया, उसके लिए जीवन, मृत्यु, सुख, दुःख, कर्म और मुक्ति के अर्थ ही बदल जाते हैं।
RELIGION / Spirituality
Maharishi Shrenik Vani (Bhag–1)
₹350.00
By: Maharishi Shrenik
ISBN: 9789366658759
Language: Hindi
Pages: 212
Format: Paperback
Category: RELIGION / Spirituality
Delivery Time: 7-9 Days





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