‘अनुभूति’ पुस्तक मेरे पूज्य पिता जी द्वारा लिखी गई कहानियों का संकलन है, लेखक की कहानियों का सार प्रेम, चाह और समर्पण है। यदि प्रेम निश्छल है तो कुछ कर गुजरने का दृढ़ संकल्प भी है। समाज की किसी भी प्रकार की रूढ़िवादिता को तोड़कर अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। ये कहानियाँ समाज के हर वर्ग के अंतर्मन को छूने की क्षमता रखती हैं। कहानियों के बारे में उस समय लेखक का क्या मंतव्य रहा होगा कहना कठिन है, किंतु जैसे – जैसे मैं इस पुस्तक के कार्य में संलग्न हुई मुझे अपने पिताजी के अंतर्मन को समझने का मौक़ा मिला। उनके गहरे अंतःकरण में एक निर्जन – द्वीप था जिसे वे कहानियों के माध्यम से अपने जज़्बातों को लिखा करते थे। जिसमें लेखक वास्तविक संसार के अंदर एक काल्पनिक समानांतर संसार बनता चला जाता है। जो इस संसार से संबंधित भी है और सवायत भी। यह अपनी निजता में स्वाधीन है। यहाँ कोई क़ानून नहीं होता। किसी का कोई प्रतिबंध नहीं होता। वहाँ पर केवल अंतःकरण होता है, संस्कार होता है और संस्कारों का दबाव होता है। उनकी सर्जनात्मकता, स्फूर्ति अपने समग्र भावनाओं से आती हैं और ये अपने आचरण पर गहरी छाप छोड़ती हैं। अंततोगतवा अंतर्द्वंद का प्रश्न अपने स्व के सामने आ ही जाता है। उसे लेखक किस प्रकार एक नया मोड़ देता है यह उसकी कथा की मूल भावना पर निर्भर करता है। लेखक को उनकी कहानियों के बीज समाज में ही कहीं न कहीं से भी मिल जाते थे,वे अपने अनुभव से कुछ और कुछ आस – पास के जीवन से संपर्क में आए लोगों के अनुभवों से कथा की पृष्ठभूमि तो मिल जाती थी किंतु कथा तो स्वयं बनानी पड़ती है। दुनियाँ में हर चीज़ परिवर्तनशील है। कहानी एक गतिशील कला है। इसकी प्रारंभ से अंत तक एक गति बनी रहती है। गतिशीलता के फलस्वरूप स्थितियाँ बदलती रहती हैं। लेखन आरंभ होने के साथ – साथ कहानी के पात्र अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व ग्रहण कर लेते हैं और चरित्र के अनुसार ही आचरण करने लगते हैं कहानियों का अंत भी होता है। लेकिन इनके जीवन का नहीं। कुछ लोग इस संकलित कहानियों में लेखक को ढूढ़ेंगे किंतु सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि कहानियों के पात्र काल्पनिक है उसी तरह घटनाएँ भी काल्पनिक हैं।

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