Samaj Ka Sach

239.00

By: Shashi Kushwaha

ISBN: 9789366652580

Language: Hindi

Pages: 112

Format: Paperback

Category: PHILOSOPHY / Social

Delivery Time: 7-9 Days

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“हम जिस समाज में जी रहे हैं, क्या हम उसे सच में जानते हैं, या हम सिर्फ वही मानते हैं जो हमें बचपन से सिखाया गया है?” यही सवाल इस किताब की शुरुआत है। “समाज का सच” कोई ऐसी किताब नहीं है जो आपको सुकून दे या आपके पहले से बने विश्वासों को और मजबूत करे। यह किताब आपको असहज कर सकती है, क्योंकि यह उन बातों पर सवाल उठाती है जिन्हें हम बिना सोचे-समझे सच मान लेते हैं। हम एक ऐसे माहौल में बड़े होते हैं जहाँ हमें धीरे-धीरे यह सिखा दिया जाता है कि क्या सही है, क्या गलत है, कैसे जीना है, किससे प्यार करना है, कब शादी करनी है और क्या बनना है। समय के साथ ये सिखाई गई बातें हमारी अपनी सोच बन जाती हैं, और हम यह भूल जाते हैं कि हमने कभी इन्हें परखा भी था या नहीं। समाज हमें एक सुरक्षित ढांचा देता है, लेकिन यही ढांचा कई बार हमें सीमित भी कर देता है। हम सवाल पूछने से डरने लगते हैं, क्योंकि हमें सिखाया गया है कि सवाल करना गलत है, या खतरनाक है। लेकिन अगर हम सवाल ही नहीं पूछेंगे, तो सच तक कैसे पहुँचेंगे? क्या यह संभव नहीं कि जिन मान्यताओं को हम सच मानते आए हैं, वे दरअसल अधूरी या गलत हों? क्या यह हो सकता है कि समाज, जिसे हम अंतिम सत्य समझते हैं, वह सिर्फ एक ऐसी कहानी हो जिसे बार-बार दोहराकर सच बना दिया गया है?

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