वास्तविकता सबके लिए अलग है, लेकिन मनुष्य अपनी इंरियों की सीमा में ही बंधा है। हम जो देखते हैं, जो समझ लेते हैं, जो सुनाई देता है, उसे सत्य मान लेते हैं। लेकिन ब्रह्मांड हमारी समझ से कहीं अधिक विशाल और जटिल हो सकता है। हम केवल 20 हर्ट्ज से 20000 हर्ट्ज तक की आवाज सुन सकते हैं और 3900 से 7800 आर्गस्ट्रॉम तरंगों तक की तरंगें ही देख सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उससे ऊपर या नीचे कुछ है ही नहीं, बस हम देख और सुन नहीं सकते। जिस प्रकार छोटी रॉकेट को उसकी वास्तविकता में कभी नहीं समझ सकती, उसी प्रकार मनुष्य भी ब्रह्मांड की अंतिम वास्तविकता को कभी पूरी तरह समझ न पाए। हम केवल उसके कुछ हिस्सों, कुछ नियमों और कुछ पैटर्न को ही जान सकते हैं। मानव मात्र लगभग 1.5 किलो मांस का एक जैविक अंग है, जिसे हम ‘दिमाग’ कहते हैं। यह हमारी जीवन रक्षा, निर्णय और दैनिक कार्यों के लिए विकसित हुआ है, न कि अनंत ब्रह्मांड की हर परत को समझने के लिए। इसलिए यह दावा करना संभव नहीं कि इसी दिमाग से सब कुछ समझने का दावा किया जा सकता है। हमारी इंदियां सीमित हैं, उपकरण हमारी मदद करते है, विज्ञान हमें आगे बढ़ाता है, फिर भी संभव है कि वास्तविकता की कुछ परतें हमेशा हमारी समझ से बाहर रहें। संभव है कि हर उत्तर के बाद एक नया प्रश्न और हर गहराई के बाद एक और गहराई हमारी प्रतीक्षा करती हो। हमारा उद्देश्य हर रहस्य को समापत करना नहीं, बल्कि प्रश्न पूछते रहना, सीमाओं को स्वीकार करना और फिर भी जानने की यात्रा में आगे बढ़ते रहना है। शायद ब्रह्मांड की पूरी तरह समझ पाने से अधिक महत्वपूर्ण, उसे समझने की हमारी यात्रा है।
Philosophy / Philosophy of Science
The Universe, As I See It (Vastavikta, Chetna aur Astitva par sabse gehre prashnon ki khoj)
₹370.00
By: Abhishek Verma
ISBN: 9789366657738
Language: Hindi
Pages: 244
Format: Paperback
Category: Philosophy / Philosophy of Science
Delivery Time: 7-9 Days

Reviews
There are no reviews yet.