मनुष्य ने अपने अस्तित्व को समझने के लिए जितनी यात्राएँ की हैं, उनमें सबसे लंबी यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की रही है। उसने आकाश को नापा, ग्रहों की गति को समझा, महासागरों की अथाह गहराइयों में उतरकर जीवन के रहस्यों को खोजा, सूक्ष्म कणों को विभाजित कर पदार्थ की संरचना को जाना, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का निर्माण कर लिया। फिर भी, उसके सामने आज भी एक ऐसा प्रदेश उपस्थित है जो उससे सबसे अधिक निकट होने के बावजूद सबसे अधिक अज्ञात है—उसकी अपनी चेतना। मनुष्य स्वयं को जानने का दावा करता है, किन्तु वह स्वयं को प्रायः उन्हीं सीमाओं के भीतर परिभाषित करता है जिन्हें उसकी इंद्रियाँ उसे दिखाती हैं। वह मान लेता है कि जो दिखाई देता है वही वास्तविक है, जो सुनाई देता है वही अस्तित्व रखता है, जो स्पर्श किया जा सकता है वही सत्य है। किंतु क्या सत्य वास्तव में इतना सीमित है? क्या ब्रह्माण्ड अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ केवल उन्हीं अनुभूतियों में समाहित हो सकता है जिन्हें हमारी ज्ञात इंद्रियाँ ग्रहण कर पाती हैं?
Philosophical & Spiritual Non-Fiction
Gyarahvin Indriya – Das Indriyon Se Pare
₹450.00
By: Kabir Shah
ISBN: 9789366653372
Language: Hindi
Pages: 280
Format: Paperback
Category: Philosophical & Spiritual Non-Fiction
Delivery Time: 7-9 Days




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